#पहिचान

राजेन्द्र महतो आ नेपाली पहचान के ओझरन के सोझरन !


  • भरत साह

बीरगंज महानगरपालिका कार्यालय में लोसार पबनी के पूर्वसांझ में एगो फुर्सताहा समयमें कुछ कर्मचारीलोग अपन अपन संस्कृति के बारे में बतियाइत रहै। एक दोसर के रीति रिवाजके छोटियाह साबित करेवाला अभिव्यक्तियो आवला पर माहौल सुमधुरे रहै। गाभी-ठट्ठा सब के बीचमें एगोड़े रोक्का थर रहल कर्मचारी गुप्ता थर रहल कर्मचारीके कौनो बातके लेके अइसन बोलैत है (नेपाली में), “मधेशीलोग में होइत होतै ओइसन मतर हमनी नेपालीलोग में ओइसन कुछो न होख’लई”! बहुते मधेशी कर्मचारीलोग रहलै उहाँवा जे इ बात भलि-भाँति सुनले रहै, लेकिन वाक्यमें प्रयोग होएल शब्दन के ऊपर केहु कौनो आपत्ति व्यक्त न करलै, न त प्रतिवादे, शायद केकरा नेपाली आ केकरा मधेशी कहके सम्बोधित कएल गेल रहै उ स्वभाविक रूपमें सहजे सब केहु बुझ चुकल रहै।
आजकाल्ह राष्ट्रीयता के ऊपर लिखाएल बहुते लेखसब पढ़लो पर उपरोक्त पक्ष के बारे में चर्चाके अकाल रहल जइसन अनुभूति होख’लै। कुछ साल पहिले इंडिया में छेत्री थर के एगो महिला भारतीय सौन्दर्य प्रतियोगितामें भाग लेहल समाचार भर फेसबुक “नेपाली मूल के महिला” कहके सम्बोधित कएल गेलै। उनकर “नेपाली” मूल कैसे एतना जल्दी थाह होलै कहके हम अपन साथीसे प्रश्न रखली त उ कहलै जे, “ क्षेत्री, गुरूंग, श्रेष्ठ, थापा, दाहाल, तामंग आदि थर रहल भारतीय लोगके मूल खोजेके न पर’लै, वंशावली देखेके न पर’लै, ओकनी के स्वत: नेपाली मूल के होइये गेलै नु” प्रश्न त उठेके चाहीं, “नेपाली मूल” के मतलब कथि ? – एगो समुदाय या जातीयता संगे सम्बन्ध रखनिहार लोग है कि हमनीके देशके भौगोलिक सीमा के भीतर उत्पत्ति ठहरहल लोग? इ प्रश्न एक बेर प्रदेश न २ के प्रमुख न्यायाधिवक्ता दिपेन्द्र झाजी अपन फेसबुक पर रखला पर केहु कुछो प्रतिक्रिये न देलै। तीन पुस्तानी उत्पत्ति खाली देखल जाओ त युपी आ बिहारके करोड़ों झा, गुप्ता, श्रीवास्तव, चौधरी, हवारी, मंडल, सिंह, यादव लोग नेपाली मूलके इकल जतै, वैवाहिक सम्बन्धके नाते! मतर एकनीके प्रगतिके समाचारसब “नेपाली” के प्रगति मानके राष्ट्रीयस्तरके समाचारपत्रमे समाचार बनल होखौक आजुले देखले न बाड़ी हमनी। जदि हमनीके देशके भूगोल हमनीके राष्ट्रीयता “नेपाली” के वाहक न होके जातीयता चाहे जातिसबके समूह एकर वाहक हैके त का साँचो “नेपाली” पहचानके राष्ट्रीयता कहेके मिलतै? फलस्वरूप इ जातिसब (चाहे ओकनीके बाह्य देश के ही काहे न रहौक) के उत्थानमें हमनीके देशके राष्ट्रीयता मजबूत होएल देखल आ अपने देशके भितरके “अनेपाली” जातिसब अर्थात् मधेशीसबके उत्थानसे राष्ट्रीयता कमजोर होएल बुझल कहाँ ले तर्कपूर्ण है? कहियो नेपाली कहके, कहियो नेपालीभाषी कहके, कहियो नेपाली मूलके कहके त कहियो गोर्खाली कहके … कौनो न कौनो नामसे हमनीके देशके बाहरके इ समुदायके विशेष चिन्ता रहल बुझालै राष्ट्रीयस्तरके संचार माध्यमसब में। एकनीके समाचार राष्ट्रीय पन्नामे छपालै। ध्यान देवेवाला बात इहो है कि मधेशके कतिपय ठाँवमें ऐतिहासिक रूपसे बसोबास करैत आएल इ समुदायके टोलसबके “नेपाली टोल” कहल जालै। सायदे होतै बंग्लादेश में बंग्लादेशी टोल, भारत में भारतीय टोल चाहे भूटान में भूटानी टोल, मतर हमनी के देश में बहुते है – नेपाल में “नेपाली टोल”, आ कौनो में मिश्रित बसोबास के इतिहास न!
त नेपाली पहचान जातियता होलै कि राष्ट्रीयता ?
आधुनिक राष्ट्रीयता सीमा आर-पार नहिए भेटल ठीक, भेटलै कि समस्यासब आवेके चालु हो जालै, खासकके बहुपहिचान रहल देशमें। सीमा आर-पार भेटेवाला राष्ट्रीयतासब एकल जातीय राष्ट्रवाद के ऊपर आधारित राष्ट्रीयता होख’लै, जैसे युरोप के अधिकांश राष्ट्रसब, एशिया में जापान, कोरिया, बंगलादेश इत्यादि। एकल जातीय राष्ट्र होलासे यी देशसबमें राष्ट्रीयता उँहवेके सबसे बड़का जातीयता जौरे सम्बन्धित रह’लै। उदाहरणके लेल जर्मनीमें ८५% जनताके जातीयता जर्मने है त शत प्रतिशत जनताके राष्ट्रीयता जर्मन, रूसमें ८१% जनताके जातीयता आ राष्ट्रीयता एक्के है त बाँकि १९% के राष्ट्रीय पहचान रूसी होलो पर जातीयता रूसी न है। हमनीके देश कौनो दृष्टिसे एकल जातीय रहल न भेटालै, जातीयता निर्माण करेवाला सब आधार हमनीके देशमें एक से बेसी है। भाषा, संस्कृति, नस्ल, धर्म, भूगोल, मूल आदि कौनो एके गो होखौक अइसन न है। त कहीं हमनी के बहु-जातीय देशके एकल जातीय पहचान प्रतिबिम्बित होखेवाला पहचान भेदभावके जननी त हैके?
हमनी के पड़ोसे में हमनी भ्रामक राष्ट्रीयताके प्रतिपादनसे उब्जल परिणामसब देख चुकल बाड़ियै। ५० के दशक ओरी पाकिस्तानके लेल संयुक्त राष्ट्रके तरफ से शौचालयके सामग्रीसब अनुदानके रूपमें पेठाएल गएल रहै। उहाँके कैबिनेटमें उ अनुदानके बखरा लगावे दिया चर्चा होइत खुनी पूर्वी पाकिस्तानके मन्त्रीसब अपनो ला अनुदान अलगावेके माग रखलै त पंजाबीलोग ओकनी के कुढ़’वैत कहलै “तोहनी बंगालीसब त केराके गाछके पिछे झाड़ा फिर’लस, तोहनी के काहे चाहीं अमेरिकन कमोड आ सिस्टर्न सब!”
परिवेश आ देश बदलल है, मतर मानसिकता उहे है हमनियो के देशमें। फरक एतने है कि पंजाबी लोग के जगह पर नेपाली सब है आ बंगालीलोग के ठाईं मधेशी लोग। बंगाली लोग जे भोगले रहै उ मधेशी लोग भोगैत है। बंगाली महिला द्वारा लगावेवाला लुगाके हिन्दुके पोशाक कहके परिभाषित करल जाइत रहै त इहाँ मधेशी द्वारा पेह्नल जाएवाला मर्दानी के भारतीय पोशाक कहके कहियो राष्ट्रीय पोशाक नबने देलै, बंगाली लोग के सेनामें भर्ती करल जतै त भारतमें मिल जतै कहके भर ढाका पंजाबी आ पठानलोग गश्ती करैत रहतियै, त इँहा मधेशीलोग देश तोडतै वाला मानसिकताके कारण सेना में नलेवेके चाहीँ वाला सोंच कायमे है। इस्लामी राष्ट्रवादके नाममें अरबी/फारसी नस्लवादमें सनकल पश्चिमी पाकिस्तानीलोग भारतीय/हिन्दु संस्कृति जैसन लागेवाला बंगाली संस्कृति आ भाषाके स्वीकार करेके न चहलै, अरबी/फारसी जैसन नलौकेवालाके नकली मुसलमान रहल ठहर करके बरजोरिये अरबी/फारसी के बोली/व्यवहार सिखेला बाध्य करेके चहलै।आजुवो इस्लामाबादमें रहल स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तानके नाम बांग्ला लिपीमें लिखल है, मतर तहिया बांग्ला भाषाके सरकारी कामकाजमें प्रयोग करे देवेसे पहिले “पाकिस्तानी”लोग शर्त राख्ले रहै – बांग्ला लिपी हिन्दु लिपी जैसन लउकला से फारसी लिपी में बांग्ला लिखाओ त सहर्ष स्वीकार होतै किदो!
नेपाली जातीय राष्ट्रवादमें आन्हर भेलसब ला मधेश आ मधेशीलोग इंडियन जैसन होलै ओहिसे फ़्रेडेरिक गेजके कहनाम कि मधेश आ मधेशीलोगके नेपालीकरण करेवाला नीतिके गरज होलै ओकनीके। नेपाली जैसन बनाके सदृषिकृत करेवाला नीयमसबके विस्तृत खांका महेन्द्रके युगमें बनावल गेलै, जनजातिसब ब्रीटिशेके पलाह में नेपाली पहचानमें सदृषिकृत हो चुकला से बाकि रहल जनसंख्या आ सामरिक रूपमें स्थायी सत्ताके बड़्का चुनौती देवेसकेवाला मधेशीयन पर लक्षित करल गेलै। महेन्द्रके पलाह में जनचेतना नहोलासे पेरेमें सहज रहै, अनेकन मधेश विरोधी नीतिसब बिना बिरोध क्रियान्वयन होलै। मधेशीयनके जनसंख्या कम रहतियै त आजुओ पेरिए देले रहतियै। कैयन विकसित देश में भी पेराएल समुदायसब होबे कर’लै, लोकतांत्रिक पद्दतिए से पेराएल! मतर पेरेमें गाह्र रहल समुदाय जौरे सम्झौता कएले से देशके हित होख’लै।

मधेशीलोगके समस्या नीति से बेसी नीयत जौरे सम्बन्ध राख’लै। उदाहरणके लेल, मधेशीलोगके सेनामें नगण्य उपस्थितिके कारण के बारेमें जिज्ञासा रखलापर कतिपय जानकार कहाएमें रुचावहुवाला लोग पूछ’लै – मधेशीसबके कौन सरकारी प्रावधान चाहे नीति रोकले है? हो सक’लै कौनो नीति न छेकले होतै, मतर नीयत रोकल’ही है। कैसनको नीति बनाऔक, मधेश विरोधी नीयत रहला तक मधेशीलोग जौरे भेदभाव न हटतै। नीति हमेशा नीयत के ऊपर आश्रित रह’लै इ बात बुझल जा सक’लै।
अब राजेन्द्र महतो के अभिव्यक्ति से राष्ट्रीयताके ऊपर गहन मंथन होखल आवश्यक आ अपिहार्य है। देश, राष्ट्र, राज्य इत्यदिके शब्दजालमें फँसाके वर्तमानके भ्रामक नेपाली पहचानके निरन्तरता देवेके चाहेवाला लोग सबला ई परिवर्तन कदापी पाच्य न होतै। एगो अइसन राष्ट्रीयताके विकास कएल जाओ जौन पहचानके विदेशी जौरे स्वदेशीलोग से बेसी सामिप्यता न राखौक; जातीय राष्ट्रवादसे नागरिक राष्ट्रवाद ओरी छलांग लगावेमें सहज होखौक। समय त लागबे करतै परिवर्तित राष्ट्रीयताके व्यवहारमें उतारेमें, मतर एगो समुदायके दोसरके भितर सदृशिकृत करलाके जगह सब समुदायके भितर एक दोसरके प्रति सहिष्णुता भाव जन्माके सबके अभिसृत होएमें सहजोग करल जा सको तभिए सबके भलाई होतियै।

                               

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