“बहुत याद आते हो तुम” | (कविता )


  • आभाष गुरु

बहुत याद आते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
जब अपने अधिकार के लिए बोल्ने पर अच्छे सुरक्षा के बद्ले मेरे मधेशि मित्रोंके छाती पर बन्दुककी गोली बरसाई जाती है ।
राजनैतिक सहमतियोँ के बदले सैकडो थारु मित्रो पर झुठा इल्जाम लगागर राजबन्दि बनाया जाता है ।

बहुत याद आते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
जब एक महिला स्वतन्त्र होकर अपना उडान भर्ने पर उन्हे बलात्कारका शिकार होनेपड़ता है
और राजनैतिक पहुँच के कारण पीडितको न्याय नहि मिल्ती है ।।

बहुत याद आते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
जब सुरक्षित कहे जानी वाली जेलों के भीतर दलित युवाका हत्या होजाता है ।
और दलितो उसे मलिक से हुए एक छोटी सी गल्ती सम्झने पर विवश होजाती है ।।

देशको खाना खिलाने वाले किसान
खाद और सिचाइ के अभाव मे अनाज ना होनेपर जब आत्महत्या करते हैं तब बहुत याद आते हो तुम ।

बहुत याद आते हो तुम
जब गरिब के चुल्हा नहि जल्ने पर तब उन्का अबोध बच्चेको रातको भुखे पेट सोना पड़ता है ।

बहुत याद आते हो तुम
जब धार्मिक एकता बनाने के जगह अपना भोट और शक्ति सन्चय के लिए मेरे भाइयोंको हिन्दु-मुस्लिम मे बाटे जाते है ।।

बहुत याद आते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
जब मा बापको अपने बच्चाको उच्च शैक्षिक फिस जमा करते करते पीठ की हड्डी कमजोर होजाती है ।

बहुत याद आते हो तुम
जब अछी सडक ,अछे अस्पताल और अछे बिधालय कि जगह गढे वाले सडक ,बिना डाक्टर कि अस्पताल और गुणस्तरहिन स्कुल देख्ता हु ।

बहुत याद आते हो तुम
बहुत याद आते हो तुम
जब तुम्हारे राजनैतिक सिन्डिकेट के कारण समाजका सबसे निच्ले तल्ला पर बैठा बालक सपना देख्ना छोड देता है ,
और हमे मालुम है सबसे खतरनाक होता है सपनों का मरजाना ।।

                               

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